तफ़सीर अल-मुख़्तसर
فَبِمَا نَقْضِهِم مِّيثَـٰقَهُمْ لَعَنَّـٰهُمْ وَجَعَلْنَا قُلُوبَهُمْ قَـٰسِيَةً ۖ يُحَرِّفُونَ ٱلْكَلِمَ عَن مَّوَاضِعِهِۦ ۙ وَنَسُوا۟ حَظًّا مِّمَّا ذُكِّرُوا۟ بِهِۦ ۚ وَلَا تَزَالُ تَطَّلِعُ عَلَىٰ خَآئِنَةٍ مِّنْهُمْ إِلَّا قَلِيلًا مِّنْهُمْ ۖ فَٱعْفُ عَنْهُمْ وَٱصْفَحْ ۚ إِنَّ ٱللَّهَ يُحِبُّ ٱلْمُحْسِنِينَ ﴿١٣﴾
उनके उस वचन का उल्लंघन करने के कारण, जो उनसे लिया गया था, हमने उन्हें अपनी दया से निष्कासित कर दिया, तथा उनके दिलों को कठोर और सख़्त बना दिया, जिस तक न तो कोई अच्छाई पहुँचती है और न ही उसे कोई नसीहत लाभ देती है। वे (अल्लाह के) शब्दों को उनके स्थानों से फेर देते हैं, इस प्रकार कि उनके शब्दों को बदल देते हैं और उनके अर्थों की व्याख्या इस तरह करते हैं जो उनकी इच्छाओं से मेल खाती है। तथा उन्होंने उनमें से कुछ बातों पर अमल करना छोड़ दिया, जिनका उन्हें उपदेश दिया गया था। (ऐ रसूल!) आपके पास उनकी अल्लाह तथा उसके मोमिन बंदों के साथ किसी न किसी विश्वासघात की ख़बर आती रहेगी। परंतु उनमें से कुछ लोगों को छोड़कर, जिन्होंने उस वचन को पूरा किया, जो उनसे लिया गया था। अतः आप उन्हें क्षमा कर दें, उनकी पकड़ न करें और उन्हें माफ़ कर दें। क्योंकि यह उपकार में से है और अल्लाह उपकार करने वालों से प्रेम करता है।