तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ ٱللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَآئِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِىَ بِإِذْنِهِۦ مَا يَشَآءُ ۚ إِنَّهُۥ عَلِىٌّ حَكِيمٌ ﴿٥١﴾
किसी इनसान के लिए उचित नहीं है कि अल्लाह उससे बात करे, सिवाय इसके कि वह़्य द्वारा उसके दिल में कोई बात डाल दे, या उससे ऐसे बात करे कि वह अल्लाह की बात तो सुनता हो लेकिन उसे देखता न हो, या उसकी ओर दूत के रूप में किसी फ़रिश्ते को भेजे, जैसे जिबरील अलैहिस्सलाम, और वह अल्लाह की अनुमति से मानव दूत (रसूल) की ओर उस चीज़ की वह़्य करे, जो अल्लाह उसकी ओर वह़्य करना चाहता है। निःसंदेह वह महिमावान (अल्लाह) अपने अस्तित्व एवं गुणों में सर्वोच्च, तथा अपनी रचना, नियति और शरीयत में हिकमत वाला है।