तफ़सीर अल-मुख़्तसर
لَقَدْ نَصَرَكُمُ ٱللَّهُ فِى مَوَاطِنَ كَثِيرَةٍ ۙ وَيَوْمَ حُنَيْنٍ ۙ إِذْ أَعْجَبَتْكُمْ كَثْرَتُكُمْ فَلَمْ تُغْنِ عَنكُمْ شَيْـًٔا وَضَاقَتْ عَلَيْكُمُ ٱلْأَرْضُ بِمَا رَحُبَتْ ثُمَّ وَلَّيْتُم مُّدْبِرِينَ ﴿٢٥﴾
निःसंदेह अल्लाह ने बहुत-से युद्धों में (ऐ ईमान वालो!) तुम्हारी कम संख्या और कमज़ोर तैयारी के बावजूद तुम्हारे दुश्मन बहुदेववादियों के खिलाफ तुम्हारी मदद की, जब तुमने अल्लाह पर भरोसा किया और साधनों को अपनाया, तथा अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध नहीं हुए। क्योंकि अधिक संख्या, उनपर तुम्हारी जीत का कारण नहीं थी। तथा हुनैन के दिन भी तुम्हारी मदद की, जब तुम अपनी अधिक संख्या पर आत्ममुग्ध हो गए और कहने लगे : आज हम कम संख्या के कारण नहीं हारेंगे। पर तुम्हारी अधिक संख्या तुम्हारे कुछ काम न आई, जिसपर तुम आत्ममुग्ध थे। चुनाँचे तुम्हारा दुश्मन तुमपर हावी हो गया और धरती अपने विस्तार के बावजूद तुमपर तंग हो गई, फिर तुम अपने शत्रुओं से हारकर भाग खड़े हुए।