तफ़सीर अल-मुख़्तसर
أَلَا تُقَـٰتِلُونَ قَوْمًا نَّكَثُوٓا۟ أَيْمَـٰنَهُمْ وَهَمُّوا۟ بِإِخْرَاجِ ٱلرَّسُولِ وَهُم بَدَءُوكُمْ أَوَّلَ مَرَّةٍ ۚ أَتَخْشَوْنَهُمْ ۚ فَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَوْهُ إِن كُنتُم مُّؤْمِنِينَ ﴿١٣﴾
(ऐ ईमान वालो!) तुम उन लोगों से युद्ध क्यों नहीं करते, जिन्होंने अपने वचनों और प्रतिज्ञाओं को तोड़ दिया, और दारुन-नदवा में अपनी बैठक में रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को मक्का से निकालने के लिए प्रयास किया, और उन्होंने ही अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के सहयोगी खुज़ाआ कबीले के विरुद्ध कुरैश के सहयोगी बक्र क़बीले की मदद करके, तुमसे युद्ध करने में पहल की है। क्या तुम युद्ध में उनके साथ मुठभेड़ से डरते हो?! तो (जान लो कि) यदि तुम वास्तव में ईमान वाले हो, तो अल्लाह इस बात का अधिक हक़दार है कि तुम उससे डरो।