तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَمَا كَانَ ٱلْمُؤْمِنُونَ لِيَنفِرُوا۟ كَآفَّةً ۚ فَلَوْلَا نَفَرَ مِن كُلِّ فِرْقَةٍ مِّنْهُمْ طَآئِفَةٌ لِّيَتَفَقَّهُوا۟ فِى ٱلدِّينِ وَلِيُنذِرُوا۟ قَوْمَهُمْ إِذَا رَجَعُوٓا۟ إِلَيْهِمْ لَعَلَّهُمْ يَحْذَرُونَ ﴿١٢٢﴾
मोमिनों के लिए उचित नहीं है कि वे सब के सब लड़ाई के लिए निकल खड़े हों, ताकि ऐसा न हो कि यदि उनका दुश्मन उनपर गालिब आ जाए तो उनका सफ़ाया कर दिया जाए। इसलिए ऐसा क्यों नहीं किया गया कि उनका एक समूह जिहाद के लिए निकलता और एक समूह अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के साथ रहता। ताकि वे आप सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से क़ुरआन और शरीयत के अहकाम सुनकर धर्म की समझ हासिल करते और अपनी जाति के लोगों को सचेत करते जब वे जो कुछ उन्होंने सीखा था उसे लेकर उनके पास लौटते; इस आशा में कि वे अल्लाह की यातना और उसके दंड से सावधान हो जाएँ तथा उसके आदेशों का पालन करने लगें और उसके निषेधों से बचने लगें। यह आयत उन सैन्यदलों के बारे में है, जिन्हें अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम आस-पास के क्षेत्रों में भेजते थे और उनके लिए अपने सहाबा के एक समूह का चयन करते थे।