तफ़सीर अल-मुख़्तसर
سَنُرِيهِمْ ءَايَـٰتِنَا فِى ٱلْـَٔافَاقِ وَفِىٓ أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ ٱلْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُۥ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ شَهِيدٌ ﴿٥٣﴾
हम शीघ्र ही मुसलमानों को विजय प्रदान करके क़ुरैश के काफ़िरों को धरती के कोने-कोने में अपनी निशानियाँ दिखाएँगे, तथा मक्का पर विजय देकर स्वयं उनके अपने भीतर भी अपनी निशानियाँ दिखाएँगे; यहाँ तक कि उनके लिए इस तरह स्पष्ट हो जाए जो शक को दूर कर दे कि यह क़ुरआन वह सत्य पुस्तक है जिसमें कोई संदेह नहीं है। क्या इन मुश्रिकों को यह जानने के लिए कि यह कुरआन सत्य है, अल्लाह की यह गवाही काफ़ी नहीं है कि यह उसी की ओर से उतरा है?! भला अल्लाह से बड़ी गवाही किसकी हो सकती है?! यदि उन्हें सत्य की तलाश होती, तो उनके लिए अपने पालनहार की गवाही पर्याप्त होती।