तफ़सीर अल-मुख़्तसर
لَّا يَحِلُّ لَكَ ٱلنِّسَآءُ مِنۢ بَعْدُ وَلَآ أَن تَبَدَّلَ بِهِنَّ مِنْ أَزْوَٰجٍ وَلَوْ أَعْجَبَكَ حُسْنُهُنَّ إِلَّا مَا مَلَكَتْ يَمِينُكَ ۗ وَكَانَ ٱللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَىْءٍ رَّقِيبًا ﴿٥٢﴾
आपके लिए (ऐ रसूल) अपनी उन पत्नियों के अलावा जो आपके निकाह में हैं, अन्य महिलाओं से शादी करना जायज़ नहीं है। तथा आपके लिए उन्हें तलाक़ देना, या उनमें से कुछ को तलाक़ देना वैध नहीं है ताकि उनके अलावा अन्य महिलाओं को ले आएँ, यद्यपि उनके अलावा जिन महिलाओं से आप शादी करना चाहते हैं, उनका सौंदर्य आपको कितना ही अच्छा क्यों न लगे। लेकिन आपके लिए उन दासियों से, जो आपके स्वामित्व में हैं, किसी विशिष्ट संख्या की सीमा के बिना लाभ उठाना जायज़ है। और अल्लाह प्रत्येक वस्तु का संरक्षक है। यह आदेश मोमिनों की माताओं (रसूल की पत्नियों) की प्रतिष्ठा को इंगित करता है। क्योंकि उन्हें तलाक़ देने और उनके रहते अन्य स्त्रियों से विवाह करने से मना किया गया है।