तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَإِذْ تَقُولُ لِلَّذِىٓ أَنْعَمَ ٱللَّهُ عَلَيْهِ وَأَنْعَمْتَ عَلَيْهِ أَمْسِكْ عَلَيْكَ زَوْجَكَ وَٱتَّقِ ٱللَّهَ وَتُخْفِى فِى نَفْسِكَ مَا ٱللَّهُ مُبْدِيهِ وَتَخْشَى ٱلنَّاسَ وَٱللَّهُ أَحَقُّ أَن تَخْشَىٰهُ ۖ فَلَمَّا قَضَىٰ زَيْدٌ مِّنْهَا وَطَرًا زَوَّجْنَـٰكَهَا لِكَىْ لَا يَكُونَ عَلَى ٱلْمُؤْمِنِينَ حَرَجٌ فِىٓ أَزْوَٰجِ أَدْعِيَآئِهِمْ إِذَا قَضَوْا۟ مِنْهُنَّ وَطَرًا ۚ وَكَانَ أَمْرُ ٱللَّهِ مَفْعُولًا ﴿٣٧﴾
और जब आप (ऐ रसूल) उस व्यक्ति से, जिसपर अल्लाह ने इस्लाम के द्वारा उपकार किया और आपने उसे आज़ाद करके उसपर उपकार किया - इससे अभिप्राय ज़ैद बिन हारिसा रज़ियल्लाहु अन्हुमा हैं, जब वह आपके पास अपनी पत्नी ज़ैनब बिन्ते जहश को तलाक़ देने के संबंध में परामर्श करने आए - आप उससे कह रहे थे : अपनी पत्नी को अपने पास रोके रखो और उसे तलाक़ न दो। और अल्लाह के आदेशों का पालन करके एवं उसके निषेधों से बचकर उससे डरो। तथा (ऐ रसूल) आप अपने दिल में ज़ैनब से अपनी शादी की बात, जिसकी अल्लाह ने आपकी ओर वह़्य उतारी थी, लोगों के भय से छिपा रहे थे। जबकि अल्लाह ज़ैद के उसे तलाक़ देने फिर आपके उससे विवाह का मामला प्रकट करने वाला था। हालाँकि अल्लाह इस बात का अधिक योग्य है कि आप इस मामले में उससे डरें। फिर जब ज़ैद का मन ज़ैनब से अलग होने पर संतुष्ट हो गया और उसे तलाक़ दे दी, तो हमने आपका उससे विवाह कर दिया, ताकि ईमान वालों पर अपने मुँह बोले बेटों की पत्नियों से विवाह करने में कोई पाप न रहे, यदि वे उन्हें तलाक दे दें और उनकी इद्दत समाप्त हो जाए। और अल्लाह का आदेश पूरा होकर ही रहता है, उसे कोई रोकने वाला और उसके आगे कोई बाधक नहीं है।