तफ़सीर अल-मुख़्तसर
أَشِحَّةً عَلَيْكُمْ ۖ فَإِذَا جَآءَ ٱلْخَوْفُ رَأَيْتَهُمْ يَنظُرُونَ إِلَيْكَ تَدُورُ أَعْيُنُهُمْ كَٱلَّذِى يُغْشَىٰ عَلَيْهِ مِنَ ٱلْمَوْتِ ۖ فَإِذَا ذَهَبَ ٱلْخَوْفُ سَلَقُوكُم بِأَلْسِنَةٍ حِدَادٍ أَشِحَّةً عَلَى ٱلْخَيْرِ ۚ أُو۟لَـٰٓئِكَ لَمْ يُؤْمِنُوا۟ فَأَحْبَطَ ٱللَّهُ أَعْمَـٰلَهُمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى ٱللَّهِ يَسِيرًا ﴿١٩﴾
वे तुमपर (ऐ ईमान वालो) अपने धन के साथ बड़े कंजूस हैं, इसलिए वे उसे खर्च करके तुम्हारी मदद नहीं करते हैं। तथा वे अपनी जानों के संबंध में भी कंजूस हैं, इसलिए वे तुम्हारे साथ लड़ाई नहीं करते। तथा वे अपनी दोस्ती के संबंध में भी कंजूस हैं, इसलिए वे तुमसे मित्रता नहीं करते। चुनाँचे जब दुश्मन से मुठभेड़ के समय भय का सामना होता है, तो आप उन्हें देखेंगे कि वे (ऐ रसूल) आपकी ओर ऐसे देखते हैं कि उनकी आँखें कायरता के कारण उस आदमी की आँखों के घूमने की तरह घूम रही हैं, जो मौत की पीड़ा से जूझ रहा हो। फिर जब उनका भय जाता रहता है और वे निश्चिंत हो जाते हैं, तो वे अपनी तेज़ ज़बानों के साथ तुम्हें कष्ट पहुँचाते हैं। वे ग़नीमत के माल के बड़े लोभी होते हैं और उसकी ताक में रहते हैं। ये लोग जो इन विशेषताओं से विशिष्ट हैं, वास्तव में ईमान ही नहीं लाए हैं। इसलिए अल्लाह ने इनके कर्मों के सवाब को व्यर्थ कर दिया। और यह व्यर्थ करना अल्लाह के लिए अति सरल है।