तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَأَصْبَحَ ٱلَّذِينَ تَمَنَّوْا۟ مَكَانَهُۥ بِٱلْأَمْسِ يَقُولُونَ وَيْكَأَنَّ ٱللَّهَ يَبْسُطُ ٱلرِّزْقَ لِمَن يَشَآءُ مِنْ عِبَادِهِۦ وَيَقْدِرُ ۖ لَوْلَآ أَن مَّنَّ ٱللَّهُ عَلَيْنَا لَخَسَفَ بِنَا ۖ وَيْكَأَنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَـٰفِرُونَ ﴿٨٢﴾
और जिन लोगों ने क़ारून के धँसने से पहले उसे प्राप्त धन और शोभा की कामना की थी, वे अफसोस और विचार करते हुए कहने लगे : क्या हम नहीं जानते थे कि अल्लाह अपने बंदों में से जिसके लिए चाहता है, रोज़ी कुशादा कर देता है और जिसके लिए चाहता है रोज़ी तंग कर देता है?! यदि हमपर अल्लाह का उपकार न होता कि उसने हमारी कही हुई बात पर हमको दंडित नहीं किया; तो वह अवश्य हमें क़ारून की तरह धँसा देता। वास्तव में काफ़िर लोग सफल नहीं होते, न दुनिया में और न आख़िरत में। बल्कि उनका अंजाम और परिणाम दोनों जगहों में नाकामी है।