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النور

आयत 63

तफ़सीर अल-मुख़्तसर

لَّا تَجْعَلُوا۟ دُعَآءَ ٱلرَّسُولِ بَيْنَكُمْ كَدُعَآءِ بَعْضِكُم بَعْضًا ۚ قَدْ يَعْلَمُ ٱللَّهُ ٱلَّذِينَ يَتَسَلَّلُونَ مِنكُمْ لِوَاذًا ۚ فَلْيَحْذَرِ ٱلَّذِينَ يُخَالِفُونَ عَنْ أَمْرِهِۦٓ أَن تُصِيبَهُمْ فِتْنَةٌ أَوْ يُصِيبَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ ﴿٦٣﴾

(ऐ ईमान वालो!) अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम का सम्मान करो। इसलिए जब आपको बुलाओ, तो आपके नाम से न बुलाओ, जैसे यह न कहो : ऐ मुहम्मद! इसी तरह आपके बाप के नाम से भी न बुलाओ, जैसे यह न कहो : ऐ अब्दुल्लाह के बेटे! जैसा कि तुम आपस में एक-दूसरे के साथ करते हो। बल्कि इस तरह कहो : ऐ अल्लाह के रसूल!, ऐ अल्लाह के नबी!, और जब वह तुम्हें किसी सामान्य कार्य के लिए बुलाएँ, तो तुम उनके बुलाने को आपस में एक-दूसरे को किसी महत्वहीन काम के लिए बुलाने की तरह न समझो। बल्कि उसका जवाब देने में जल्दी करो। अल्लाह उन लोगों को अच्छी तरह जानता है, जो तुममें से बिना अनुमति के चुपके से निकल जाते हैं। अतः उन लोगों को डरना चाहिए जो अल्लाह के रसूल सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम के आदेश का उल्लंघन करते हैं कि अल्लाह उन्हें किसी विपत्ति और परीक्षण से पीड़ित न कर दे, या उन्हें दर्दनाक यातना से पीड़ित न कर दे, जिसे वे सहन न कर सकें।