तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَلَئِنْ أَتَيْتَ ٱلَّذِينَ أُوتُوا۟ ٱلْكِتَـٰبَ بِكُلِّ ءَايَةٍ مَّا تَبِعُوا۟ قِبْلَتَكَ ۚ وَمَآ أَنتَ بِتَابِعٍ قِبْلَتَهُمْ ۚ وَمَا بَعْضُهُم بِتَابِعٍ قِبْلَةَ بَعْضٍ ۚ وَلَئِنِ ٱتَّبَعْتَ أَهْوَآءَهُم مِّنۢ بَعْدِ مَا جَآءَكَ مِنَ ٱلْعِلْمِ ۙ إِنَّكَ إِذًا لَّمِنَ ٱلظَّـٰلِمِينَ ﴿١٤٥﴾
अल्लाह की क़सम! (ऐ नबी!) यदि आप उन यहूदियों और ईसाइयों के पास जिन्हें किताब दी गई थी, इस बात पर हर प्रकार की निशानी और प्रमाण ले आएँ कि क़िबला का बदलना सत्य है; तब भी वे आपके क़िबले की ओर रुख नहीं करेंगे, उसके प्रति हठ करके जो आप लेकर आए हैं तथा सत्य का पालन करने से अहंकार करते हुए। तथा आप उनके क़िबले की ओर मुख करने वाले नहीं हैं जबकि अल्लाह ने आपको उससे फेर दिया है। तथा वे स्वयं परस्पर एक-दूसरे के क़िबले की ओर रुख़ करने वाले नहीं हैं; क्योंकि उनमें से प्रत्येक दूसरे समूह को काफ़िर कहता है। यदि आपने क़िबला तथा अन्य नियमों और विधानों के बारे में इन लोगों की इच्छाओं का पालन किया, इसके बाद कि आपके पास सही ज्ञान आ चुका है, जिसमें कोई संदेह नहीं; तो निश्चय आप उस समय हिदायत को छोड़ने तथा इच्छा का अनुसरण करने के कारण, अत्याचारियों में से हो जाएँगे। यहाँ नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को संबोधित करने का मक़सद अह्ले किताब का पालन करने की बुराई (कुरूपता) को दर्शाना है। अन्यथा, अल्लाह ने अपने नबी को उससे सुरक्षित रखा है। इसलिए यह आपके बाद आपकी उम्मत के लिए एक चेतावनी है।