तफ़सीर अल-मुख़्तसर
وَيَجْعَلُونَ لِمَا لَا يَعْلَمُونَ نَصِيبًا مِّمَّا رَزَقْنَـٰهُمْ ۗ تَٱللَّهِ لَتُسْـَٔلُنَّ عَمَّا كُنتُمْ تَفْتَرُونَ ﴿٥٦﴾
और मुश्रिक लोग हमारे दिए हुए अपने धनों में से एक भाग अपनी उन मूर्तियों के लिए भी निर्धारित करते हैं, जो कुछ नहीं जानती हैं (क्योंकि वे निर्जीव चीज़ें हैं, और न ही वे लाभ या हानि पहुँचाने का अधिकार रखती हैं), वे इसके द्वारा उनकी निकटता प्राप्त करना चाहते हैं। अल्लाह की क़सम! (ऐ मुश्रिको!) तुमसे क़ियामत के दिन तुम्हारे इस दावे के बारे में ज़रूर पूछा जाएगा कि ये मूर्तियाँ पूज्य हैं और यह कि तुम्हारे धन में उनका भी एक हिस्सा है।