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अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 521

51:7 क़सम है रास्तों वाले आकाश की!

51:8 निःसंदेह तुम निश्चय एक विवादास्पद बात[2] में पड़े हो।

51:9 उससे वही फेरा जाता है, जो (अल्लाह के ज्ञान में) फेर दिया गया है।

51:10 अटकल लगाने वाले मारे गए।

51:11 जो बड़ी ग़फ़लत में भूले हुए हैं।

51:12 वे पूछते[3] हैं कि बदले का दिन कब है?

51:13 जिस दिन वे आग पर तपाए जाएँगे।

51:14 अपने फ़ितने (यातना) का मज़ा चखो, यही है जिसके लिए तुम जल्दी मचा रहे थे।

51:15 निःसंदेह परहेज़गार लोग बाग़ों और जल स्रोतों में होंगे।

51:16 जो कुछ उनका रब उन्हें देगा, उसे वे लेने वाले होंगे। निश्चय ही वे इससे पहले नेकी करने वाले थे।

51:17 वे रात के बहुत थोड़े भाग में सोते थे।[4]

51:18 तथा रात्रि की अंतिम घड़ियों[5] में वे क्षमा याचना करते थे।

51:19 और उनके धनों में माँगने वाले तथा वंचित[6] के लिए एक हक़ (हिस्सा) था।

51:20 तथा धरती में विश्वास करने वालों के लिए बहुत-सी निशानियाँ हैं।

51:21 तथा स्वयं तुम्हारे भीतर (भी)। तो क्या तुम नहीं देखते?

51:22 और आकाश ही में तुम्हारी रोज़ी[7] है तथा वह भी जिसका तुमसे वादा किया जा रहा है।

51:23 सो क़सम है आकाश एवं धरती के पालनहार की! निःसंदेह यह बात निश्चित रूप से सत्य है, इस बात की तरह कि निःसंदेह तुम बोलते हो।[8]

51:24 क्या आपके पास इबराहीम के सम्मानित अतिथियों की सूचना आई है?

51:25 जब वे उसके पास आए, तो उन्होंने सलाम कहा। उसने कहा : सलाम हो। कुछ अपरिचित लोग हैं।

51:26 फिर वह चुपके से अपने घरवालों के पास गया। फिर एक मोटा-ताज़ा (भुना हुआ) बछड़ा ले आया।

51:27 फिर उसे उनके सामने रख दिया। कहा : क्या तुम नहीं खाते?

51:28 तो उसने उनसे दिल में डर महसूस किया। उन्होंने कहा : डरो नहीं। और उन्होंने उसे एक बहुत ही ज्ञानी पुत्र की शुभ-सूचना दी।

51:29 यह सुनकर उसकी पत्नी चिल्लाती हुई आगे आई, तो उसने अपना चेहरा पीट लिया और बोली : बूढ़ी बाँझ!

51:30 उन्होंने कहा : तेरे पालनहार ने ऐसे ही फरमाया है। निश्चय वही पूर्ण हिकमत वाला, अत्यंत ज्ञानी है।