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अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 604

112:1 (ऐ रसूल!) आप कह दीजिए : वह अल्लाह एक है।[1]

112:2 अल्लाह बेनियाज़ है।

112:3 न उसकी कोई संतान है और न वह किसी की संतान है।

112:4 और न कोई उसका समकक्ष है।[2]

113:1 (ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं सुबह के पालनहार की शरण लेता हूँ।

113:2 उस चीज़ की बुराई से, जो उसने पैदा की।

113:3 तथा अंधेरी रात की बुराई से, जब वह छा जाए।[1]

113:4 तथा गाँठों में फूँकने वालियों की बुराई से।

113:5 तथा ईर्ष्या करने वाले की बुराई से, जब वह ईर्ष्या करे।[2]

114:1 (ऐ नबी!) कह दीजिए : मैं शरण लेता हूँ लोगों के पालनहार की।

114:2 लोगों के बादशाह की।

114:3 लोगों के सत्य पूज्य की।[1]

114:4 वसवसा डालने वाले, पीछे हट जाने वाले की बुराई से।

114:5 जो लोगों के दिलों में वसवसे डालता है।

114:6 जिन्नों और इनसानों में से।[2]