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अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 603

109:1 (ऐ नबी!) आप कह दीजिए : ऐ काफ़िरो!

109:2 मैं उसकी इबादत नहीं करता, जिसकी तुम इबादत करते हो।

109:3 और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

109:4 और न मैं उसकी इबादत करने वाला हूँ, जिसकी इबादत तुमने की है।

109:5 और न तुम उसकी इबादत करने वाले हो, जिसकी मैं इबादत करता हूँ।

109:6 तुम्हारे लिए तुम्हारा धर्म तथा मेरे लिए मेरा धर्म है।[1]

110:1 (ऐ नबी!) जब अल्लाह की सहायता एवं विजय आ जाए।

110:2 और आप लोगों को देखें कि वे अल्लाह के धर्म में दल के दल प्रवेश कर रहे हैं।[1]

110:3 तो आप अपने पालनहार की प्रशंसा के साथ उसकी पवित्रता का वर्णन करें और उससे क्षमा माँगें, निःसंदेह वह बहुत तौबा क़बूल करने वाला है।[2]

111:1 अबू लहब के दोनों हाथ नाश हो जाएँ! और वह (स्वयं) विनष्ट हो गया।[1]

111:2 उसका धन तथा जो कुछ उसने कमाया था, उसके काम नहीं आया।

111:3 जल्द ही वह लपट वाली आग में दाख़िल होगा।[2]

111:4 तथा उसकी पत्नी (भी जहन्नम में जाएगी), जो ईंधन उठाने वाली है।

111:5 उसकी गर्दन में मज़बूत बटी हुई रस्सी होगी।[3]