अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 602
106:1 क़ुरैश को मानूस कर देने के कारण।
106:2 उन्हें जाड़े तथा गर्मी की यात्रा से मानूस कर देने के कारण।[1]
106:3 अतः उन्हें चाहिए कि इस घर (काबा) के मालिक की इबादत करें।[2]
106:4 जिसने उन्हें भूख में खिलाया तथा उन्हें भय से सुरक्षित किया।
107:1 (ऐ नबी!) क्या आपने उसे देखा, जो बदले के दिन को झुठलाता है?
107:2 तो यही है, जो अनाथ (यतीम) को धक्के देता है।
107:3 तथा ग़रीब को खाना खिलाने के लिए प्रोत्साहित नहीं करता है।[1]
107:4 तो विनाश है उन नमाज़ियों के लिए,[2]
107:5 जो अपनी नमाज़ से लापरवाह हैं।
107:6 वे जो दिखावा करते हैं।
107:7 तथा साधारण बरतने की चीज़ भी माँगने से नहीं देते।[3]
108:1 (ऐ नबी!) हमने आपको कौसर प्रदान किया है।[1]
108:2 तो आप अपने पालनहार ही के लिए नमाज़ पढ़ें तथा क़ुर्बानी करें।[2]
108:3 निःसंदेह आपका शत्रु ही बे नाम व निशान है।[3]