अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 600
100:6 निःसंदेह इनसान अपने पालनहार का बड़ा कृतघ्न (नाशुक्रा) है।
100:7 और निःसंदेह वह इसपर स्वयं गवाह है।[1]
100:8 और निःसंदेह वह धन के मोह में बड़ा सख़्त है।[2]
100:9 तो क्या वह नहीं जानता, जब क़ब्रों में जो कुछ है, निकाल बाहर किया जाएगा?
100:10 और जो कुछ सीनों में है, वह प्रकट कर दिया जाएगा।[3]
100:11 निःसंदेह उनका पालनहार उस दिन उनके बारे में पूरी ख़बर रखने वाला है।[4]
101:1 वह खड़खड़ा देने वाली।
101:2 क्या है वह खड़खड़ा देने वाली?
101:3 और तुम क्या जानो कि वह खड़खड़ा देने वाली क्या है?[1]
101:4 जिस दिन लोग बिखरे हुए पतिंगों की तरह हो जाएँगे।
101:5 और पर्वत धुने हुए रंगीन ऊन की तरह हो जाएँगे।[2]
101:6 तो जिसके पलड़े भारी हो गए,
101:7 तो वह संतोषजनक जीवन में होगा।
101:8 तथा जिसके पलड़े हल्के हो गए,
101:9 उसका ठिकाना 'हाविया' (गड्ढा) है।
101:10 और तुम क्या जानो कि वह ('हाविया') क्या है?
101:11 वह एक बहुत गर्म आग है।[3]
102:1 तुम्हें (धन, संतान की) बहुतायत पर गर्व ने ग़ाफ़िल कर दिया।
102:2 यहाँ तक कि तुम क़ब्रिस्तान जा पहुँचे।[1]
102:3 कदापि नहीं, तुम शीघ्र ही जान लोगे।
102:4 फिर कदापि नहीं, तुम शीघ्र ही जान लोगे।
102:5 कदापि नहीं, यदि तुम निश्चित ज्ञान के साथ जान लेते (तो ऐसा न करते)।[2]
102:6 निश्चय तुम अवश्य जहन्नम को देखोगे।
102:7 फिर निश्चय तुम उसे अवश्य विश्वास की आँख से देखोगे।
102:8 फिर निश्चय तुम उस दिन नेमतों के बारे में अवश्य पूछे जाओगे।[3]