>

अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 587

82:1 जब आकाश फट जाएगा।

82:2 तथा जब तारे झड़ जाएँगे।

82:3 और जब समुद्र बह निकलेंगे।

82:4 और जब क़बरें उलट दी जाएँगी।

82:5 तब प्रत्येक प्राणी जान लेगा, जो उसने आगे भेजा और जो पीछे छोड़ा।[1]

82:6 ऐ इनसान! तुझे किस चीज़ ने तेरे उदार पालनहार से बहका दिया?

82:7 जिसने तेरी रचना की, फिर तुझे ठीक ठाक किया, फिर तुझे संतुलित बनाया।

82:8 जिस रूप में भी उसने चाहा, तुझे बना दिया।[2]

82:9 हरगिज़ नहीं, बल्कि तुम बदले (के दिन) को झुठलाते हो।

82:10 हालाँकि निःसंदेह तुमपर निगेहबान नियुक्त हैं।

82:11 जो सम्माननीय लिखने वाले हैं।

82:12 वे जानते हैं, जो तुम करते हो।[3]

82:13 निःसंदेह नेक लोग बड़ी नेमत (आनंद) में होंगे।

82:14 और निःसंदेह दुराचारी लोग जहन्नम में होंगे।

82:15 वे उसमें बदले के दिन प्रवेश करेंगे।

82:16 और वे उससे कभी ग़ायब होने वाले नहीं हैं।[4]

82:17 और आप क्या जानें कि बदले का दिन क्या है?

82:18 फिर आप क्या जानें कि बदले का दिन क्या है?

82:19 जिस दिन कोई प्राणी किसी प्राणी के लिए किसी चीज़ का अधिकार न रखेगा और उस दिन आदेश केवल अल्लाह का होगा।[5]

83:1 विनाश है नाप-तौल में कमी करने वालों के लिए।

83:2 वे लोग कि जब लोगों से नापकर लेते हैं, तो पूरा लेते हैं।

83:3 और जब उन्हें नापकर या तौलकर देते हैं, तो कम देते हैं।

83:4 क्या वे लोग विश्वास नहीं रखते कि वे (मरने के बाद) उठाए जाने वाले हैं?