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अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 446

37:1 क़सम है पंक्तिबद्ध (फ़रिश्तों) की!

37:2 फिर झिड़क कर डाँटने वालों की!

37:3 फिर (अल्लाह के) ज़िक्र (वाणी) की तिलावत करने वालों की।[1]

37:4 निःसंदेह तुम्हारा पूज्य निश्चय एक ही है।

37:5 जो आकाशों और धरती का तथा उन दोनों के बीच की समस्त चीज़ों का स्वामी है और सूर्य के उदय होने के सभी स्थानों का मालिक है।

37:6 निःसंदेह हमने संसार के आकाश को एक सुंदर शृंगार के साथ सुशोभित किया है, जो सितारे हैं।

37:7 और प्रत्येक सरकश शैतान से सुरक्षित करने के लिए।

37:8 वे सर्वोच्च सभा (मला-ए-आ'ला) के फ़रिश्तों की बात नहीं सुन सकते, तथा वे हर ओर से (उल्काओं से) मारे जाते हैं।

37:9 भगाने के लिए। तथा उनके लिए स्थायी यातना है।

37:10 परंतु जो कोई (शैतान फरिश्तों की किसी बात को) अचानक उचक ले जाए, तो एक दहकता हुआ अंगारा (उल्का)[2] उसका पीछा करता है।

37:11 तो आप इन (काफ़िरों) से पूछें कि क्या इन्हें पैदा करना अधिक कठिन है या उनका जिन्हें[3] हम पैदा कर चुके? निःसंदेह हमने उन्हें[4] एक लेसदार मिट्टी से पैदा किया है।

37:12 बल्कि आपने आश्चर्य किया और वे उपहास करते हैं।

37:13 और जब उन्हें नसीहत की जाए, तो वे क़बूल नहीं करते।

37:14 और जब वे कोई निशानी देखते हैं, तो खूब उपहास करते हैं।

37:15 तथा कहते हैं कि यह तो मात्र खुला जादू है।

37:16 क्या जब हम मर गए और मिट्टी तथा हड्डियाँ हो चुके, तो क्या सचमुच हम अवश्य उठाए जाने वाले हैं?

37:17 और क्या हमारे पहले बाप-दादा भी (उठाए जाएँगे)?

37:18 आप कह दीजिए : हाँ! तथा तुम अपमानित (भी) होगे!

37:19 वह बस एक ही झिड़की होगी, तो एकाएक वे देख रहे होंगे।

37:20 तथा वे कहेंगे : हाय हमारा विनाश! यह तो बदले का दिन है।

37:21 यही निर्णय का दिन है, जिसे तुम झुठलाया करते थे।

37:22 (आदेश होगा कि) इकट्ठा करो उन लोगों को जिन्होंने अत्याचार किया तथा उनके साथियों को और जिनकी वे उपासना किया करते थे ।

37:23 अल्लाह के सिवा। फिर उन्हें जहन्नम की राह दिखा दो।

37:24 और उन्हें ठहराओ[5], निःसंदेह वे प्रश्न किए जाने वाले हैं।