>

अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 372

26:112 (नूह़ ने) कहा : मूझे क्या मालूम कि वे क्या कर्म करते रहे हैं?

26:113 उनका ह़िसाब तो मेरे पालनहार ही के ज़िम्मे है, यदि तुम समझो।

26:114 और मैं ईमान वालों को धुतकारने वाला[21] नहीं हूँ।

26:115 मैं तो बस एक खुला डराने वाला हूँ

26:116 उन्होंने कहा : ऐ नूह़! यदि तू बाज़ नहीं आया, तो अवश्य संगसार किए गए लोगों में से हो जाएगा।

26:117 उसने कहा : ऐ मेरे पालनहार! निःसंदेह मेरी जाति ने मुझे झुठला दिया!

26:118 अतः तू मेरे और उनके बीच दो-टूक निर्णय कर दे, तथा मुझे और जो ईमानवाले मेरे साथ हैं, उन्हें बचा ले।

26:119 तो हमने उसे और उन लोगों को जो उसके साथ भरी हुई नाव में थे, बचा लिया।

26:120 फिर उसके बाद शेष लोगों को डुबो दिया।

26:121 निःसंदेह इसमें निश्चय एक बड़ी निशानी है। और उनमें से अधिकतर ईमानवाले नहीं थे।

26:122 और निःसंदेह आपका पालनहार, निश्चय वही सबपर प्रभुत्वशाली, अत्यंत दयावान् है।

26:123 आद ने रसूलों को झुठलाया।

26:124 जब उनसे उनके भाई हूद[22] ने कहा : क्या तुम डरते नहीं हो?

26:125 निःसंदेह मैं तुम्हारे लिए एक अमानतदार रसूल हूँ।

26:126 अतः तुम अल्लाह से डरो और मेरी बात मानो।

26:127 मैं इस (कार्य) पर तुमसे कोई पारिश्रमिक (बदला) नहीं माँगता, मेरा बदला तो केवल सारे संसारों के पालनहार पर है।

26:128 क्या तुम हर ऊँचे स्थान पर एक स्मारक बनाते हो? इस स्थिति में कि व्यर्थ कार्य करते हो।

26:129 तथा बड़े-बड़े भवन बनाते हो, शायद कि तुम सदा जीवित रहोगे।

26:130 और जब तुम पकड़ते हो, तो बड़ी निर्दयता से पकड़ते हो।

26:131 अतः अल्लाह से डरो और जो मैं कहता हूँ, उसे मानो।

26:132 तथा उससे डरो जिसने उन चीज़ों से तुम्हारी मदद की, जिन्हें तुम जानते हो।

26:133 उसने चौपायों और बेटों से तुम्हारी मदद की।

26:134 तथा बाग़ों और जल स्रोताें से।

26:135 निश्चय ही मैं तुमपर एक बड़े दिन की यातना से डरता हूँ।

26:136 उन्होंने कहा : हमारे लिए बराबर है कि तू नसीहत करे, या नसीहत करने वालों में से हो।