अज़ीज़ुल-हक़ उमरी — 239
12:31 चुनाँचे जब उसने उन स्त्रियों की छलकपट की बात सुनी, तो उन्हें बुला भेजा और उनके लिए गाव-तकिए लगवाए और प्रत्येक स्त्री को एक छुरी दे दी।[8] और उसने (यूसुफ़ से) कहा : इनके सामने आ जाओ। फिर जब उन स्त्रियों ने उसे देखा, तो उन्होंने उसे बहुत बड़ा समझा और अपने हाथ काट डाले तथा बोल उठीं : अल्लाह की पनाह! यह मनुष्य नहीं है। यह तो कोई सम्मानित फ़रिश्ता है।
12:32 वह बोली : यह वही है, जिसके बारे में तुम मेरी निंदा कर रही थीं। वास्तव में, मैंने ही उसे रिझाया था, मगर वह बच निकला। और यदि वह मेरी बात न मानेगा, तो अवश्य ही बंदी बना दिया जाएगा और अवश्य ही अपमानित होगा।
12:33 यूसुफ़ ने प्रार्थना की : ऐ मेरे पालनहार! मुझे क़ैद उससे अधिक प्रिय है, जिसकी ओर ये औरतें मुझे बुला रही हैं। और यदि तूने मुझसे इनके छल को दूर नहीं किया, तो मैं इनकी ओर झुक जाऊँगा और अज्ञानियों में से हो जाऊँगा।
12:34 तो उसके पालनहार ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और उससे उनके छल को दूर कर दिया। निःसंदेह वह बड़ा सुनने वाला, बड़ा जानने वाला है।
12:35 फिर उन लोगों[9] ने निशानियाँ[10] देख लेने के बाद यही उचित समझा कि उस (यूसुफ़) को एक अवधि तक के लिए जेल में रखें।
12:36 और क़ैदखाने में उसके साथ दो युवक दाख़िल हुए। उनमें से एक ने कहा : मैंने स्वप्न देखा है कि शराब निचोड़ रहा हूँ। और दूसरे ने कहा : मैंने स्वप्न देखा है कि अपने सिर के ऊपर रोटी उठाए हुए हूँ, जिसमें से पक्षी खा रहे हैं। हमें इसका अर्थ बता दीजिए। हम देख रहे हैं कि आप सदाचारियों में से हैं।
12:37 यूसुफ़ ने कहा : तुम दोनों के पास जो भोजन आता है, उसके तुम्हारे पास आने से पहले ही मैं तुम्हें उसकी हक़ीक़त बता दूँगा; यह उन बातों में से है, जो मेरे पालनहार ने मुझे सिखाई हैं। मैंने उन लोगों का धर्म त्याग दिया है, जो अल्लाह पर ईमान नहीं रखते और जो आख़िरत का इनकार करने वाले हैं।